"भ्रम"भाग -4
भ्रम (भाग-4)
कहते हैं कि एक झूठ को छुपाने के लिए सौ झूठों का सहारा और लेना पड़ता है। ऐसा ही कुछ महसूस हुआ जब सुजाता ने फाइल के सबसे आखिरी पेपर को देखा। उसे देख कर तो उसके होश ही उड़ गए। जिस धोखे को वो अपना भाग्य समझ कर भूलने की कोशिश कर रही थी । उस धोखे ने सुजाता के एक और भ्रम को आज तोड़ दिया।
जो थोड़ा बहुत विश्वाश उसके मन में अपनें ससुराल वालों के प्रति कहीं बचा भी था। आज उसके भी टुकड़े टुकड़े होकर बिखर गए। जिस उम्मीद की लौ उसके मन में दुबारा से जगने लगी थी वो भी आज हमेशा के लिए भुज गई। जब उसे मनीष की मेडिकल फाइल को देखकर ये पता चला कि मनीष कुछ सालों से नहीं बल्कि बचपन से ही ऐसा है। भले ही कुछ बातें उसकी समझ के बाहर थी । लेकिन उसे सारी रिपोर्टों को देखकर ये समझते देर नहीं लगी कि उसके पति की दिमागी हालत सुधरने के बजाय बिगड़ती ही जा रही है।
अब तक सुजाता को देखकर लग रहा था कि उसमें बहुत हिम्मत है। मगर आज वो एक बेजान सी किसी वस्तु की भांति लग रही है। आज उसके पास न कोई उम्मीद है और न ही किसी के प्रति कोई विश्वाश ही बचा है और अपने जीवन का कोई उद्देश्य तो दूर दूर तक कही भी उसे दिखाई नहीं दे रहा । ऐसी परिस्थिति में उस इंसान का क्या अस्तित्व रह जाता है ? जब ना उसके पास कोई उम्मीद हो और ना जीने का कोई उद्देश्य। और विश्वाश की तो बात ही क्या करें उसकी तो परछाइयों से डर भी डर लगने लगा है उसे।
आज सुबह से ही हल्की बूंदा बांदी लगी हुई है। प्रिया ने श्रुति को बताया की उसकी बहन सुजाता को बारिश में भीगना बहुत पसंद है। आज अगर तेज बारिश हुई तो हम तीनों ही छत पर नहाने चलेंगे। कुछ देर बाद जब बारिश तेज हुई तो प्रिया सुजाता को ढूंढती हुई कमरे में आई। उसने देखा कि,
सुजाता के हाथों में फाइल खुली हुई है और आंखों में आसूं लिए न जानें वो किस सोच में डूबी हुई है। उसे इतना भी होश नहीं है कि खिड़की से आती बारिश की बूंदे उसके पैरों को भिगा रही हैं। प्रिया ने उसे आवाज भी दी लेकिन उसने कुछ सुना ही नहीं। प्रिया ने उसके हाथ से फाइल उठाई तो उसे कुछ होश आया। प्रिया को देख कर सुजाता घबरा ही गई । और फाइल को प्रिया के हाथ से छीन लिया । प्रिया ने पूछा भी कि वो किस चीज की फाइल है तो उसने बहाना बना दिया की ऐसे ही कुछ पुराने पेपर रखे हुए हैं। लेकिन प्रिया उसके बोलने के तरीके से ये समझ गई की सुजाता उससे कुछ छुपा रही है। सुजाता ने जल्दी से अपने कमरे में जाकर फाइल को अलमारी में छुपा दिया । लेकिन प्रिया ने उसे फाइल छुपाते हुए देख लिया था। थोड़ी देर बाद प्रिया सुजाता के पास जाकर पूछा । दीदी आप रो क्यों रहीं थी? और आप मुझसे क्या छुपा रही हो? मुझे बहुत चिंता हो रहीं है । बताओ ना क्या बात है? सुजाता जानती थी कि अगर प्रिया को उसके ससुराल वालों के झूठ के बारे में पता लगा तो उसके पिता तक ये बात पहुंचते देर नहीं लगेगी। और ये वो बिल्कुल भी नहीं चाहती थी। इसलिए उसने प्रिया को कुछ भी बताना ठीक नहीं समझा। और बात को टाल दिया।
सुजाता का किसी भी काम में मन ही नहीं लग रहा। और वो प्रिया से भी ज्यादा बात नहीं करना चाहती । इसीलिए सर दर्द का बहाना बनाकर लेट गई। प्रिया भी अपनी बहन को इस तरह देख कर उदास हो गई और उस वक्त उसने सुजाता से ज्यादा कुछ पूछना ठीक नहीं समझा।
सुजाता को आज अपने वर्तमान से ज्यादा अपना अतीत अच्छा लगने लगा है। उसमें कम से कम भविष्य के लिए कुछ उम्मीदें तो थी। जूठा ही सही एक विश्वाश तो था। उम्मीद तो वो नाव है जिंदगी कि जिसके सहारे इंसान बुरे से बुरे दौर को पार कर लेता है। लेकिन आज ना तो उसके पास कोई उम्मीद है और ना ही किसी पर विश्वास।
अपने भविष्य में उसे सिर्फ अंधेरा ही अंधेरा नजर आ रहा है। सुजाता ने लेटे हुए खिड़की के बाहर अपनी नजर दौड़ाई तो आज बारिश को देख कर उसे शादी से पहले वाली मायके में वो अपनी आखिरी बारिश की याद आ गई।
कितनी खुश थी सुजाता उस दिन अपने आने वाले कल को लेकर। उसकी आंखों ने भविष्य के कितने सुनहरे सपने देखे थे मनीष के साथ। उन्हीं सपनों के आज टुकड़े बिखरे हुए पड़ें हैं । उसे समझ ही नहीं आ रहा की आखिर हर बार उसका विश्वाश क्यूं टूट जाता है ? क्या किसी पर विश्वास करने की ये सजा होती है ? जो बारिश कभी उसे खूब भाती थी ।आज वही बारिश की बूंदे उसे दूर से ही तीर की भांति चुभ रहीं हैं। अपनी पुरानी यादों को सोचते सोचते आंख बंद करके कहीं खो सी गई।
थोड़ी देर बार प्रिया ने सुजाता को सोते देख अलमारी से वो फाइल निकाली और धीरे से देखने लगी। प्रिया अभी फाइल को पूरी देख भी नहीं पाई की सुजाता की आंख खुल गई। और उसने प्रिया के हाथ से फाइल लेनी चाही। वैसे भी नींद थी ही कहां उसकी आंखों में। कितने सवाल थे जिनका जवाब उसे जानना था ? लेकिन उसने खुद को बस प्रिया की खातिर रोक रखा था ।क्यों कि ये लड़ाई उसे खुद ही लड़नी है। वो नहीं चाहती कि उसके घर वालों को कुछ भी पता चले। लेकिन प्रिया ने वो फाइल सुजाता को दी ही नहीं। और सुजाता को न चाहते हुए भी प्रिया को
सब कुछ बताना पड़ा। प्रिया को तो अपनी बहन की बातों पर विश्वास ही नहीं हो रहा । उसे लग रहा है जैसे वो कोई बुरा सपना देख रही हो। प्रिया ने सुजाता से पूछा कि आखिर वो इतनी बड़ी बात को हम लोगों से क्यूं छुपा रही थी ? क्या शादी के बाद हम लोग तुम्हारे नहीं है? इतना ही रिश्ता है क्या हम सब से तुम्हारा? हमें तो लग रहा था कि तुम अपने ससुराल में बहुत खुश हो। लेकिन तुमने तो शादी के बाद हमें भुला ही दिया। अगर मैं यहां नहीं आती तो तुम क्या कभी कुछ बताती हमें ? कहते कहते दोनों बहने गले लगके खूब रोई।
आज शायद सारे भेद खुल ही जानें थे। मनीष ने वहां आके दोनों बहनों को रोते देखा तो वो डर गया और श्रुति के पास जाकर चिल्लाने लगा कि क्या बात है? ये दोनो क्यों रो रही हैं? श्रुति मनीष की बात सुनकर घबरा गई और सुजाता के पास जाकर देखा तो दोनों बहनों की आंखों में आसूं देखकर पूछने लगी। भाभी आप दोनों क्यों रो रहीं हो ? क्या बात हो है मुझे बताओ? क्या आपको अपने घर की याद आ रही है ?
प्रिया का मन हो रहा था की वो कुछ बोले लेकिन सुजाता ने उसे पहले ही चुप रहने के लिए बोल दिया था। श्रुति जब बार बार सुजाता से पूछने लगी तो अंत में सुजाता ने बस यही कहा कि मैं आप से कुछ नहीं कहना चाहती, आप मुझसे कुछ मत पूछिए । मुझे तो बस मम्मी जी और पापा जी से कुछ पूछना है। थोड़ी देर बाद मनीष के माता पिता भी आ गए। उनको देख कर मनीष कुछ ज्यादा ही भड़क गया उसे लगा इन्होंने ही सुजाता से कुछ कहा होगा जाने से पहले । मनीष का सुजाता से अधिक लगाव होने के कारण वो उसे दुखी नहीं देख सकता। अपनी मां से पूछने पर जब उसे कुछ भी पता नहीं चला तो उसने अपनी मां की गर्दन को जोर से पकड़ा । लेकिन सुजाता ने जल्दी जाकर उसको समझाया तो बड़ी मुश्किल से उसने अपनी मां को छोड़ा। ऐसा मनीष पहले भी कई बार कर चुका था। प्रिया तो ये सब देख कर बहुत डर गई। जैसे तैसे सुजाता ने मनीष को संभाला और सुला दिया।
सुजाता अपनी सासू मां से कुछ पूछती उससे पहले ही उन्होंने सुजाता से पूछा की क्या बात हुई थी ? तुमने तो मनीष को कुछ नहीं कहा । सुजाता ने उस दिन पहली बार अपनी सासू मां से गुस्से में बोला ,
मैं क्या कह सकती हूं मम्मी जी किसी से, आपने कुछ कहने लायक छोड़ा ही कहां है मुझे। रमा जी (सुजाता की सास) ने इस तरह अचानक से सुजाता के मुंह से ऐसी बाते सुनी तो उन्हें अपने कानों पर विश्वास ही नहीं हुआ कि सुजाता इस तरह भी बात कर सकती है।
रमा जी-- सुजाता आखिर बात क्या है ? तुम मुझसे इस तरह बात क्यों कर रही हो? क्या तुम भूल गई हो कि अपनी सास से कैसे बात की जाती है।
सुजाता-- क्यों मम्मी जी आप लोग इतना बड़ा झूठ बोल सकते हो ?, और मुझे अपना गुस्सा जाहिर करने का भी हक नहीं हैं। आपको क्या लगा मुझे कुछ भी पता नहीं चलेगा? माना कि मैं ज्यादा नहीं पढ़ी लेकिन अनपढ़ भी नहीं हूं।
क्या कहा था आपने मुझसे आपका बेटा बचपन से बीमार नहीं है। ठीक हो सकता है! है ना!
सुजाता की सारी बाते सुनकर जमुना लाल जी भी वहां आ गए। और सुजाता को समझाने की कोशिश करने लगे।
जमुना लाल जी-- बेटा तुम्हें कोई गलत फहमी हुई है। किसने कहा तुमसे ये सब?
सुजाता-- पापा जी कम से कम अब तो आप लोग झूठ मत बोलिए , आपको जो करना था आपने कर लिया अब क्या चाहते हैं आप ? आज मैने आपके बेटे की वो सारी रिपोर्ट देख ली जिनको आप ने मुझसे छुपाया था। क्या
आपके लिए किसी लड़की की जिंदगी से ज्यादा जरूरी अपने बेटे के घर को बसाना था?
आप लोगों ने तो अच्छा प्लान बनाया फ्री में जिंदगी भर के लिए एक कामवाली रखने का। आप लोग तो फ्री हो गए अपने लड़के को मेरे पल्लू से बांध कर, है ना!
कहते कहते सुजाता की आंखों से आंसू बहने लगे और गला रूंध गया। चाहते हुए भी वो कुछ बोल नहीं पाई।
थोड़ी देर बाद सुजाता का भाई और और उसके पिताजी भी वहां आ गए। जिन्हें देख कर सुजाता , रमा जी, और जमुना लाल जी तीनों ही अचंभित से हो गए। क्यों कि उन्हें ये नहीं पता था कि प्रिया ने अपने घर फोन करके सारी बातें बता दी हैं।
लेकिन सुजाता ये बिल्कुल नहींचाहती थी कि उसके घर वालों को इस बात का अभी पता चले।
दोनों ही पक्षों के बीच काफी देर तक वार्तालाप हुआ । सुजाता के पिता नहीं चाहते है कि सुजाता अब वहां एक पल भी रुके । सुजाता को उन्होंने अपने साथ चलने के लिए कहा। लेकिन सुजाता जल्द बाजी में कोई भी फैसला नहीं लेना चाहती। हरी प्रसाद जी के बहुत समझाने पर भी सुजाता उनके साथ नहीं गई। क्यों कि वो जानती थी कि आज उसका यहां से जाना ठीक नहीं है।
आखिर मजबूरन उन लोगों को वहां से जाना पड़ा। हरी प्रसाद जी अपनी बेटी की घुटन को महसूस तो कर रहे है लेकिन कुछ कर पाने में असमर्थ है। क्यों कि सुजाता की मर्जी के बिना वे कोई भी फैसला नहीं ले सकते। बार बार खुद ही अपने आप को धिक्कार रहे हैं। उन्हें ऐसा महसूस होने लगा जैसे अपनी बेटी को खुद उन्होंने ही कुएं में धकेल दिया हो। एक ही प्रश्न उनके मन को बार बार विचलित कर रहा है कि आखिर क्यों उन्होंने पूरी छान बीन नहीं की लड़के वालों की? क्यों उन्होंने पैसे को ही बेटी का सुख समझा ? पैसे वाले घर ने उनकी आंखों पर पर्दा जो गिरा दिया था। सुजाता की मां भी बहुत दुखी है अपनी बेटी की जिंदगी को इस तरह बिखरा हुआ देख कर।
उधर बेटी की चिंता सता रही है । तो इधर अपने पति को चिंतित देखकर समझ ही नहीं आ रहा कि क्या करे? एक मन हो रहा है कि पुलिस थाने जाकर जमुना लाल जी के खिलाफ शिकायत दर्ज कर दें। लेकिन उन्हें पता है कि पैसों की बदौलत उन्हे कोई सजा नहीं होगी। पैसा खिलाकर कितने अपराधों को छुपा दिया जाता है । अगर हमारे देश में अपराधों पर उचित समय पर कार्यवाही की जाती और निष्पक्ष निर्णय लिया जाता, तो क्या कोई दोबारा से उन्हीं अपराधों को करने की कोशिश करता ???
क्रमश: अगले भाग में...
Seema Priyadarshini sahay
19-Oct-2021 09:59 PM
बहुत खूबसूरती से आपने लिखा
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Niraj Pandey
19-Oct-2021 06:16 PM
बहुत ही बेहतरीन
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